
अनन्या के कदम घर से बाहर निकलते हुए लड़खड़ा रहे थे। उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे, लेकिन वह उन्हें पोंछने की कोशिश भी नहीं कर रही थी। जिस घर में कुछ घंटे पहले तक वह अपने आने वाले बच्चे के सपने देख रही थी, उसी घर की दीवारों के बीच आज उसे अपने जीवन का सबसे बड़ा धोखा मिला था। रोहन के शब्द, निशा की बातें और कबीर के साथ हुई घटना—सब कुछ उसके दिमाग में एक साथ घूम रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह किस पर विश्वास करे और किस पर नहीं। जिस इंसान को उसने अपनी जिंदगी का सबसे भरोसेमंद साथी माना था, वही उसकी पीठ पीछे उसकी पूरी दुनिया छीनने की तैयारी कर रहा था।
रोहन उसके पीछे भागते हुए बाहर आया, लेकिन तब तक अनन्या कार के पास पहुँच चुकी थी। ड्राइवर उसके लिए दरवाज़ा खोलने ही वाला था कि अनन्या ने उसकी तरफ देखा और बिना कुछ कहे उसके हाथ से चाबी ले ली। ड्राइवर कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वह ड्राइविंग सीट पर बैठ चुकी थी। रोहन कुछ दूर से चिल्लाया, "अनन्या, रुको! मेरी बात सुनो!" लेकिन अनन्या ने उसकी तरफ देखा तक नहीं। उसने कार स्टार्ट की और अगले ही पल गाड़ी तेज़ रफ्तार से घर के गेट से बाहर निकल गई।
स्टीयरिंग पर अनन्या के हाथ काँप रहे थे। आँखों के सामने आँसू होने के कारण सड़क भी ठीक से दिखाई नहीं दे रही थी, फिर भी वह गाड़ी रोकना नहीं चाहती थी। उसे बस उस घर से दूर जाना था। जितना दूर जा सकती थी, उतना दूर। उसके मन में बार-बार एक ही सवाल उठ रहा था—जिस रोहन के लिए उसने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, क्या वह सच में कभी उससे प्यार करता था? या फिर शुरू से ही उसके पास सिर्फ़ उसके पैसे, उसकी कंपनी और उसकी ताकत के लिए था? और निशा... जिसे वह अपनी बहन से भी ज्यादा मानती थी, वह इतने सालों से उसके साथ सिर्फ़ एक झूठा रिश्ता निभा रही थी।
"मैंने तुम दोनों का क्या बिगाड़ा था?" उसने खुद से कहा और उसकी आवाज़ आँसुओं में कहीं खो गई। एक हाथ से उसने अपना पेट पकड़ लिया। उसके अंदर पल रहा बच्चा उस वक्त उसके लिए दुनिया की एकमात्र ऐसी चीज़ था जो पूरी तरह उसकी अपनी थी। लेकिन उसी पल एक डर ने उसे घेर लिया। अगर रोहन सच में उसके बच्चे को भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहता है तो? क्या वह अपने बच्चे को उससे छीनने देगा? इस ख्याल से ही अनन्या का दिल बैठने लगा।
उधर घर की खिड़की से निशा अनन्या की जाती हुई कार को देख रही थी। उसकी आँखों में आँसू या पछतावे का नामोनिशान नहीं था। वह बस उस कार को तब तक देखती रही जब तक वह उसकी आँखों के सामने से गायब नहीं हो गई। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी, लेकिन उसकी आँखों के भीतर जैसे कोई खतरनाक योजना आकार ले चुकी थी। कुछ सेकंड बाद उसके होंठों पर एक बेहद हल्की मुस्कान आई और वह खिड़की से हटकर नीचे जाने लगी।
नीचे हॉल में रोहन बेचैनी से इधर-उधर घूम रहा था। उसके चेहरे पर गुस्सा भी था और चिंता भी। जैसे ही निशा सीढ़ियों से नीचे आई, उसने उसे देखते ही कहा, "तुमने ये क्या कर दिया, निशा? जब मैं सब कुछ संभाल रहा था तो तुम्हें बीच में बोलने की जरूरत क्या थी? मैंने कितनी मुश्किल से उसे अपने भरोसे में रखा था और तुमने एक ही पल में सब बर्बाद कर दिया।"
निशा ने उसे शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, "तुम इतना परेशान क्यों हो रहे हो? अनन्या चली गई तो चली गई। हमें उसकी जरूरत ही क्या है?" लेकिन रोहन ने तुरंत उसकी बात काट दी। "तुम समझती नहीं हो। बात सिर्फ़ कंपनी की नहीं है।" उसने कुछ पल रुककर कहा, "वह मेरे बच्चे की माँ बनने वाली है।"
निशा ने उसकी तरफ अजीब नजरों से देखा। रोहन सोफे के पास जाकर बैठ गया और अपना माथा पकड़ लिया। उसके दिमाग में अब एक अलग ही योजना चल रही थी। उसने धीमी आवाज़ में कहा, "मैं उसे मारना नहीं चाहता था। मैं सब कुछ बहुत आसानी से कर सकता था। उसे थोड़ा समय देता, उसे फिर से अपने भरोसे में ले आता। बच्चा पैदा होने तक उसे अपने साथ रखता और उसके बाद..." वह कुछ पल चुप हुआ, फिर बोला, "बच्चा भी मुझसे दूर नहीं जाता। अनन्या को या तो पूरी तरह अपने कंट्रोल में रखता, या फिर उसे किसी तरह मेंटली unstable साबित करके किसी mental hospital तक भेज देता। उसके बाद कंपनी और बच्चा दोनों मेरे पास रहते।"
निशा कुछ सेकंड तक उसे देखती रही। फिर उसके चेहरे पर गुस्सा आ गया। "तो तुम्हें अभी भी उसकी जरूरत है?" उसने तीखे स्वर में पूछा। रोहन ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा। निशा आगे बढ़ी और बोली, "आखिर एक बच्चे की ही तो बात है। अगर तुम्हें बच्चा चाहिए तो मैं तुम्हें बच्चा दे सकती हूँ। उसके लिए तुम्हें अनन्या की क्या जरूरत है? क्या मैं बच्चा पैदा नहीं कर सकती या तुम्हें सिर्फ़ उसी के साथ बच्चा चाहिए?"
निशा के इस सवाल ने रोहन को पूरी तरह चुप कर दिया। उसके पास कोई जवाब नहीं था। उसने अपना सिर पकड़ लिया और सोफे पर बैठ गया। निशा का गुस्सा अब और बढ़ता जा रहा था। वह लगातार बोलती रही, "तुम्हारी यही कमजोरी है, रोहन। तुम हर चीज़ को जरूरत से ज्यादा complicated बना देते हो। कंपनी हमारे पास है, पैसा हमारे पास है और अब अनन्या को भी हमारी सच्चाई पता चल चुकी है। उसकी अब हमारी लाइफ में जरूरत नहीं है, तुम्हे ये छोटी सी बात क्यों नहीं समझ आ रही है ।"
रोहन ने सिर उठाकर उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब चिंता साफ थी। "यही तो डर है मुझे। अगर उसने पुलिस को बता दिया, अगर उसने बोर्ड को सबूत दिखा दिए, अगर उसने अपने शेयरों के लिए बोर्ड मेंबर्स को मन लिया तो?" निशा कुछ पल चुप रही। फिर अचानक उसके चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान फैल गई। उसने धीरे-धीरे कहा, "तो फिर उसे मौका ही क्यों देना?"
रोहन ने उसकी तरफ देखा।
निशा उसके करीब आई और बहुत शांत आवाज़ में बोली, "आज अनन्या और उसके बच्चे से हमारा पीछा छूट जायेगा , आज वह सिर्फ़ इस घर से नहीं, हमारी जिंदगी से भी चली जाएगी... और कभी वापस नहीं आएगी।"
रोहन के चेहरे के भाव अचानक बदल गए। उसने निशा की तरफ देखा, जैसे वह उसके शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम क्या करने वाली हो?" उसने पूछा, लेकिन निशा ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस कुछ सेकंड तक उसे देखती रही। फिर उसके होंठों पर एक बेहद खतरनाक मुस्कान आई।
उस मुस्कान में ऐसा कुछ था जिसे देखकर रोहन भी पहली बार असहज हो गया।
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