10

साँस चल रही है।

Bali की शाम अपने आप में बेहद खूबसूरत थी। आसमान पर सूरज ढलने लगा था और समुद्र की लहरें नारंगी रोशनी में चमक रही थीं। ठंडी हवा में समुद्र की हल्की नमकीन खुशबू घुली हुई थी। अनन्या होटल की बालकनी में खड़ी दूर तक फैले समुद्र को देख रही थी। पिछले कुछ दिनों में उसकी जिंदगी जैसे अचानक उलट-पुलट हो गई थी। कबीर का एक्सीडेंट, उसका गायब होना, कंपनी को लेकर अनजाने डर और अब यह सफर... उसके दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था।
तभी पीछे से रोहन की आवाज़ आई।
"मैडम, आज शाम मेरे साथ चलने के लिए तैयार हैं?"
अनन्या ने पलटकर उसे देखा और हल्का सा मुस्कुरा दी।
"कहाँ?"
रोहन ने रहस्यमयी अंदाज़ में कहा,-"ये नहीं बता सकता। बस इतना समझ लो कि आज की शाम तुम्हारे लिए है।"
अनन्या ने भौंहें सिकोड़ते हुए पूछा,-"कोई सरप्राइज तो नहीं है?"
"अगर बता दिया तो सरप्राइज कैसा?"अनन्या के चेहरे पर कई दिनों बाद सच्ची मुस्कान आई।
"ठीक है... चलो।"
रोहन ने उसका हाथ थाम लिया-" लेकिन आज ऑफिस की कोई बात नहीं होगी।"
अनन्या ने तुरंत जवाब दिया,-"ठीक है, कोशिश करूँगी।"
"कोशिश नहीं। प्रॉमिस।"
अनन्या हँस पड़ी-"अच्छा बाबा, प्रॉमिस।"
दोनों होटल से बाहर निकले।
कुछ देर बाद रोहन उसे समुद्र के बिल्कुल किनारे बने एक खूबसूरत रेस्टोरेंट में ले आया। रेस्टोरेंट का एक हिस्सा खुले आसमान के नीचे था। चारों तरफ छोटे-छोटे दीये और मोमबत्तियाँ जल रही थीं। सामने समुद्र की लहरें लगातार किनारे से टकरा रही थीं और दूर आसमान पर डूबते सूरज की आखिरी रोशनी दिखाई दे रही थी।
अनन्या कुछ पल तक उस जगह को देखती रह गई।
"रोहन..."
"पसंद आया?" उसने धीरे से पूछा।
अनन्या ने सिर हिलाया- "बहुत खूबसूरत है।"
रोहन ने उसके लिए कुर्सी खींची।
"आज की शाम में कोई ऑफिस नहीं, कोई मीटिंग नहीं और कोई ख्याल नहीं। सिर्फ़ तुम और मैं।"
अनन्या बैठ गई।कुछ ही देर में टेबल पर खाना परोसा जाने लगा। मोमबत्तियों की रोशनी में दोनों आमने-सामने बैठे थे। समुद्र की लहरों की आवाज़ और हल्का संगीत पूरे माहौल को और खूबसूरत बना रहा था।
अनन्या कुछ देर तक चुपचाप समुद्र देखती रही।
फिर उसने कहा,-"काफी समय बाद मुझे ऐसा लग रहा है कि मैं सच में आराम कर रही हूँ।"
रोहन ने मुस्कुराकर कहा,-"इसीलिए तो तुम्हें यहाँ लाया हूँ।"
फिर उसने वेटर को इशारा किया।वेटर एक छोटा सा खूबसूरत बॉक्स लेकर आया।अनन्या ने हैरानी से उसे देखा- "अब ये क्या है?"
रोहन ने बॉक्स उसके सामने रखा- "खोलो।"
अनन्या ने धीरे से बॉक्स खोला।अंदर एक बेहद खूबसूरत छोटा सा ब्रेसलेट था।उस पर एक छोटा-सा पेंडेंट लगा था, जिस पर एक नन्हा सा दिल बना हुआ था।
अनन्या की आँखों में चमक आ गई- "ये बहुत सुंदर है।"
रोहन ने ब्रेसलेट उठाया और उसके हाथ में पहनाते हुए कहा- "ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं है।"
अनन्या ने उसे सवालिया नज़रों से देखा- "तो फिर?"
रोहन- "तुम दोनों के लिए"
अनन्या- "दोनों? कौन?"
रोहन कुछ पल उसे देखता रहा।फिर उसने अपना फ़ोन निकला, और डॉक्टर की रिपोर्ट अनन्या के सामने रख दी! उसने कुछ सेकंड तक उसे समझने की कोशिश की।फिर उसकी आँखें अचानक बड़ी हो गईं।
"ये..."
उसकी आवाज़ रुक गई।रोहन धीरे से मुस्कुराया।
"हाँ, अनन्या..."-उसने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया-"तुम माँ बनने वाली हो।"
कुछ पल के लिए जैसे पूरी दुनिया रुक गई।अनन्या की आँखें तस्वीर पर टिकी थीं।फिर उसकी आँखों में आँसू भर आए।
"सच?"
रोहन ने सिर हिलाया।
"बिल्कुल सच।"
अनन्या ने काँपते हाथों से अपना हाथ पेट पर रख लिया।
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े, लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं थे।ये खुशी के थे।
"मैं... माँ बनने वाली हूँ..."
वह धीमे से हँसी और रोहन को गले लगा लिया।रोहन ने भी उसे गले लगाया।कुछ देर तक दोनों वैसे ही खड़े रहे।अनन्या के लिए उस वक्त दुनिया में सिर्फ़ एक ही चीज़ मायने रखती थी।उसका आने वाला बच्चा।कुछ देर बाद वह वापस कुर्सी पर बैठी और प्रेग्नन्सी रिपोर्ट को देखती रही।
"हमारा बच्चा..."
उसके चेहरे पर ऐसी चमक थी जो पिछले कई दिनों में कहीं दिखाई नहीं दी थी।
"मैं सोच भी नहीं सकती थी कि मेरी जिंदगी में इतनी बड़ी खुशी आएगी।"
रोहन ने उसका हाथ दबाया।
"मैंने कहा था न... तुम्हारी जिंदगी में अभी बहुत सारी खुशियाँ आनी बाकी हैं।"
अनन्या ने मुस्कुराकर कहा,-"मैं इसे बहुत प्यार करूँगी।"
"मुझे पता है।"
"और तुम?"
रोहन ने बिना देर किए जवाब दिया,-"मैं भी। ये हमारी सबसे बड़ी खुशी होगी।"
अनन्या फिर मुस्कुरा दी।कुछ देर के लिए वह कबीर को भूल गई।उसे वह रात याद नहीं रही जब वह पुलिस का फोन सुनकर टूट गई थी। उसे कंपनी की चिंता भी याद नहीं रही। उसे यह भी याद नहीं रहा कि उसके आसपास कितने लोग उसे धोखा दे रहे थे।उस समय उसके सामने सिर्फ़ उसका आने वाला बच्चा था।
उसने धीरे से कहा,-"अब मेरी जिंदगी बदलने वाली है।"
रोहन ने उसकी तरफ देखा-"हाँ... बहुत ज्यादा।"
उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसे अनन्या समझ नहीं पाई।
...
डिनर खत्म होने के बाद दोनों समुद्र के किनारे टहलने लगे।अनन्या नंगे पैर रेत पर चल रही थी।कभी वह लहरों को देखती और कभी अपने पेट पर हाथ रख लेती।
"रोहन..."
"हम्म?"
"तुम्हें क्या लगता है, बेटा होगा या बेटी?"
रोहन मुस्कुराया।
"जो भी होगा, तुम्हारी तरह जिद्दी होगा।"
अनन्या ने उसे हल्का सा धक्का दिया।
"मैं जिद्दी नहीं हूँ।"
"अच्छा?"
"हाँ।"
"तो फिर कल से ऑफिस जाने की जिद मत करना।"
अनन्या अचानक रुक गई।
उसने रोहन की तरफ देखा।
"क्या मतलब?"
रोहन ने शांत आवाज़ में कहा,-"मेरा मतलब है कि अब तुम्हें थोड़ा आराम करना चाहिए।"
अनन्या ने सिर हिलाया-"आराम करूँगी, लेकिन काम भी तो करना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि कंपनी सिर्फ़ एक बिज़नेस नहीं है, रोहन। मैंने उसे बनाया है।"
रोहन के चेहरे की मुस्कान थोड़ी कम हो गई-"लेकिन अब तुम्हें अपने बच्चे के बारे में सोचना चाहिए।"
"मैं सोच रही हूँ।"
"तो फिर काम क्यों?"
अनन्या ने थोड़ा गंभीर होकर कहा,-"क्योंकि मैं माँ बनने वाली हूँ इसका मतलब ये नहीं कि मैं अपना सब कुछ छोड़ दूँ।"
रोहन चुप हो गया।
कुछ पल तक सिर्फ़ समुद्र की आवाज़ सुनाई देती रही।
फिर उसने कहा,-"तुम हमेशा काम को मुझसे और अपनी जिंदगी से ऊपर रखती हो।"
"ऐसा नहीं है।"
"तो फिर ऐसा क्यों लगता है?"
अनन्या उसकी तरफ देखने लगी।रोहन की आवाज़ में अब हल्का गुस्सा था- "तुम्हें पता भी है कि तुम्हारी सेहत कितनी जरूरी है? अब तुम्हारे साथ सिर्फ़ तुम्हारी जिंदगी नहीं जुड़ी है। तुम्हारे अंदर हमारा बच्चा है।"
अनन्या की आँखें अचानक उदास हो गईं।
"मैं बच्चे की परवाह नहीं करती ऐसा तुम कैसे कह सकते हो?"
रोहन कुछ बोलने वाला था, लेकिन उसने अनन्या के चेहरे की उदासी देख ली।
वह तुरंत शांत हो गया।
उसने अनन्या का हाथ पकड़ लिया- "सॉरी...मेरा वो मतलब नहीं था।"
अनन्या चुप रही।रोहन ने धीरे से कहा,-"हम इस बारे में बाद में बात करेंगे। अभी तुम्हें स्ट्रेस लेने की जरूरत नहीं है।"
अनन्या ने सिर हिला दिया।दोनों वापस होटल लौट आए।कमरे में पहुँचकर रोहन ने उसे पानी दिया और डॉक्टर द्वारा दी गई दवा उसके हाथ में रख दी-"ये ले लो। फिर आराम करो।"
अनन्या ने दवा ली।कुछ ही देर बाद वह बिस्तर पर लेट गई।रोहन उसके पास बैठा रहा।अनन्या की आँखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं।
"रोहन..."
"हम्म?"
"आज मैं बहुत खुश हूँ।"
रोहन ने उसके माथे पर हाथ रखा।
"सो जाओ।"
"हमारा बच्चा..."
उसकी आवाज़ धीरे-धीरे नींद में खो गई।रोहन कुछ देर तक उसे देखता रहा।फिर उसके चेहरे से मुस्कान गायब हो गई।उसने खिड़की के पास जाकर फोन निकाला।स्क्रीन पर कंपनी के शेयरों की नई रिपोर्ट थी।
अब वह कंपनी का सबसे बड़ा शेयरहोल्डर था। ये कंपनी जो वो अनन्या से चाहता था आखिर उसके पास है! उसने रिपोर्ट बंद की और सोती हुई अनन्या की तरफ देखा। उसके दिमाग में कुछ देर पहले का विचार फिर लौट आया।
*"अगर अनन्या रास्ते में रही तो..."*
लेकिन फिर उसकी नज़र अनन्या के पेट पर गई।वह कुछ देर तक चुपचाप खड़ा रहा। पहली बार उसके चेहरे पर उलझन थी। वह क्या करने वाला था? और अब उसे क्या करना चाहिए? इस सवाल का जवाब उसके पास भी नहीं था।
...
उधर Bali से हजारों किलोमीटर दूर...एक घने जंगल के बीच एक छोटी सी झोपड़ी थी।बाहर रात गहरी हो चुकी थी।पेड़ों के बीच से आती हवा के कारण झोपड़ी की खिड़की बार-बार हिल रही थी।अंदर मिट्टी के चूल्हे के पास एक बूढ़ा आदमी बैठा था।उसके पास ही एक बूढ़ी औरत कुछ जड़ी-बूटियाँ पीस रही थी।दोनों के चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
बूढ़ी औरत ने धीमे स्वर में पूछा,-"इतने दिन हो गए... अभी तक होश क्यों नहीं आया?"
बूढ़े आदमी ने सामने देखा।झोपड़ी के दूसरे कोने में घास और सूखे पत्तों से बना एक साधारण-सा बिस्तर था।उस पर एक आदमी बेहोश पड़ा था।
वह कबीर था।
उसकी कमर से नीचे एक कपड़ा पड़ा हुआ था। शरीर पर जगह-जगह गहरे घाव और चोट के निशान थे। सिर पर पट्टी बंधी थी। कंधे और हाथ पर भी कई जगह पट्टियाँ थीं। कुछ घावों पर बूढ़ी औरत ने जड़ी-बूटियों से बने लेप लगाए थे।
बूढ़े आदमी ने कबीर की नब्ज़ देखी-"साँस चल रही है।"
"लेकिन कब तक?"-बूढ़ी औरत की आवाज़ में चिंता थी।
बूढ़े आदमी ने धीरे से कहा,-"जब तक इसकी किस्मत साथ है। जरूर hi इसका कोई काम अधूरा रहा होगा जिसकी वजह से ये अपनी साँसे नहीं छोड़ रहा है, वरना इसके बचने की तो कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही "
बूढ़ी औरत ने कबीर के चेहरे की तरफ देखा-"ये कौन है?"
बूढ़ा आदमी कुछ पल चुप रहा-"पता नहीं।"
"तो फिर इसे यहाँ क्यों लाए?"
बूढ़े आदमी ने लंबी साँस ली- "तीन दिन पहले नदी के पास मिला था। आधा शरीर पानी में था। अगर हम इसे वहाँ छोड़ देते तो सुबह तक इसकी लाश मिलती।"
बूढ़ी औरत ने कबीर की तरफ देखा- "क्या इसे कुछ याद होगा ?पता नहीं कब तक होश में आएगा! "
कुछ पल दोनों चुप रहे।फिर बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा,-"शहर वालों का लगता है।"
बूढ़े आदमी ने कबीर के कपड़ों की तरफ देखा- "हाँ।"
उसी समय कबीर की उँगली हल्की सी हिली, बूढ़ी औरत अचानक उसकी तरफ झुकी।
"देखो!"
बूढ़े आदमी ने तुरंत कबीर की नब्ज़ पकड़ी, कबीर की साँस थोड़ी तेज़ हो गई थी।उसके होंठ हिले। आवाज़ इतनी धीमी थी कि दोनों मुश्किल से सुन पाए।
"अनन्या..."
बूढ़ी औरत ने हैरानी से बूढ़े आदमी की तरफ देखा- "इसने किसी का नाम लिया।"
कबीर ने फिर कुछ कहने की कोशिश की।
लेकिन इस बार सिर्फ़ एक टूटी हुई आवाज़ निकली—"धोखा।रो...हन..."
और फिर उसकी आँखें दोबारा बंद हो गईं।बूढ़े आदमी और औरत ने एक-दूसरे को देखा।अब उन्हें समझ आ चुका था कि यह आदमी सिर्फ़ किसी हादसे का शिकार नहीं था।इसके पीछे कोई कहानी थी।और वह कहानी...बहुत बड़ी थी।उधर Bali में अनन्या अपने आने वाले बच्चे के सपने देख रही थी।और भारत के एक अनजान जंगल में...कबीर मौत और जिंदगी के बीच लड़ रहा था।उसे अभी यह नहीं पता था कि अनन्या को बचाने के लिए उसके पास सिर्फ़ वक्त की कमी नहीं थी...
बल्कि उसे होश में आते ही उस इंसान का सामना करना था, जो अब इस खेल के आखिरी पड़ाव पर है! 
रोहन।
क्रमशः...

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