07

एक जोरदार टक्कर हुई।

रात के करीब दस बज रहे थे।

अनन्या के घर के डाइनिंग एरिया में हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। लंबी डाइनिंग टेबल पर तरह-तरह की डिशेज़ सजी हुई थीं। गरमा-गरम रोटियाँ, सब्ज़ियाँ, पास्ता, सलाद और अनन्या की पसंदीदा डेज़र्ट... देखने में पूरा माहौल किसी खुशहाल परिवार की तस्वीर जैसा लग रहा था।

टेबल की हेड चेयर पर अनन्या बैठी थी। उसके एक तरफ़ रोहन और दूसरी तरफ़ निशा बैठी थी। तीनों के बीच लगातार हँसी-मज़ाक चल रहा था।

"तुम दोनों को पता है," निशा हँसते हुए कह रही थी, "अगर अनन्या ने कंपनी का काम थोड़ा कम नहीं किया, तो एक दिन ये डाइनिंग टेबल भी ऑफिस की मीटिंग टेबल बन जाएगी। और हम सब बोर्ड मेंबर्स !"

अनन्या हँस पड़ी।

"तुम दोनों मिलकर मेरा मज़ाक उड़ाने के अलावा कुछ करते भी हो?"

रोहन ने तुरंत कहा,

"मैं तो तुम्हारी ही साइड   ले रहा हूँ।"

निशा ने उसकी तरफ देखकर नकली गुस्से में कहा,

"अच्छा? अभी दो मिनट पहले तो तुम खुद कह रहे थे कि मैडम काम की वजह से लोगों को भूल जाती हैं।"

तीनों फिर हँस पड़े।

बाहर से देखने पर वह पल बिल्कुल परफेक्ट था।

एक सफल पत्नी...उसका प्यार करने वाला पति...और उसकी सबसे करीबी दोस्त। जैसे अनन्या की ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी ही नहीं थी। लेकिन उसे क्या पता था कि उसी मेज पर बैठे दो लोग उसकी मुस्कान के पीछे छिपी पूरी दुनिया को खत्म करने की योजना बना चुके थे।

तभी अचानक...

टिंग!

अनन्या के फोन पर मैसेज की नोटिफिकेशन आई। तीनों की नज़र एक साथ फोन की तरफ चली गई।

निशा ने माहौल हल्का करने के लिए मज़ाकिया अंदाज़ में कहा, "ये लो, मैडम को ठीक से खाना भी नहीं खाने देते।"

अनन्या मुस्कुराई और उसने फोन उठा लिया। स्क्रीन पर नाम देखकर उसकी मुस्कान धीरे-धीरे थोड़ कम हो गई।

कबीर मल्होत्रा।

अनन्या कुछ सेकंड तक स्क्रीन को देखती रही। उसके चेहरे पर आए बदलाव को रोहन और निशा दोनों ने नोटिस कर लिया।

रोहन ने तुरंत पूछा, "क्या हुआ, बेबी? सब ठीक है न?"

अनन्या अभी भी मैसेज के बारे में सोच रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कबीर को ऐसा क्या मिल गया है, जिसके लिए उसे रात में उसके घर आना पड़ रहा है। फिर उसने मैसेज का जवाब टाइप किया।

"Okay. Come at my place. We will talk."

मैसेज भेजने के बाद उसने फोन टेबल पर रखा और रोहन की तरफ देखकर बोली,

"कुछ नहीं। कबीर को मेरे से कुछ इम्पोर्टेन्ट डिस्कशन करना था । उसने कहा बहुत जरूरी है, इसलिए अभी घर आ रहा है।"

"कबीर?"

निशा के मुँह से अनजाने में निकल गया। रोहन ने भी चुपचाप उसकी तरफ देखा। दोनों के चेहरों पर आई गंभीरता अनन्या की नज़र से नहीं बची।

वह तुरंत हँसते हुए बोली, "अरे यार, तुम दोनों ऐसे उदास क्यों हो गए?"

फिर उसने रोहन की तरफ देखते हुए कहा, "मैं जल्दी से काम खत्म कर लूँगी और टाइम पर सो जाऊँगी। तुम परेशान मत हो।"

रोहन ने जबरदस्ती मुस्कुराने की कोशिश की- "मैं परेशान नहीं हूँ। बस... अचानक काम आ गया इसलिए।"

लेकिन उसके मन में इस वक्त सिर्फ़ एक ही बात चल रही थी—

क्या कबीर को कुछ पता चल गया है?

कुछ ही सेकंड में उसकी सारी योजना खतरे में पड़ सकती थी। क्योंकि अगर कबीर ने अनन्या को शेयर ट्रांसफर वाले दस्तावेज़ दिखा दिए... अगर उसने CFO की सच्चाई बता दी... अगर उसने होटल और कैफ़े वाली बात सामने रख दी...या और कोई ऐसी बात जिससे अनन्या को मुझपर शक हो...तो अनन्या के सामने सब कुछ खत्म हो जाएगा। और सबसे बड़ी समस्या यह थी कि शेयर ट्रांसफर की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई थी। रोहन ने कागज़ों पर अपनी पकड़ बना ली थी, लेकिन कंपनी के बाकी बोर्ड मेंबर्स की औपचारिक मंज़ूरी अभी बाकी थी।

जब तक वह मंज़ूरी नहीं मिलती, तब तक अनन्या के पास सब कुछ रोक देने का अधिकार था।सब कुछ ख़तम हो सकता था, इतनी मेहनत सब बेकार हो जाएगी ...उसे बस कुछ दिन चाहिए थे। कुछ दिन... और अनन्या को उससे दूर रखना था।

...

अनन्या ने अचानक अपनी कुर्सी से उठते हुए कहा, "एक मिनट।"

रोहन ने उसकी तरफ देखा। अनन्या उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक छोटा-सा एनवेलप निकाला।

उसने रोहन की गर्दन में अपना हाथ डाला और उसके बिलकुल करीब होते हुए उस एनवेलप को आप रोहन के चेहरे के सामने करते हुए कहा -"ये तुम्हारे लिए है।"

रोहन ने हैरानी से एनवेलप देखा।

"मेरे लिए?"

अनन्या ने मुस्कुराते हुए उसे खोला। अंदर से दो एयरलाइन टिकट बाहर निकले। रोहन की आँखें अचानक फैल गईं।

"ये..."

अनन्या खुशी से बोली,- "Bali की टिकट्स!"

रोहन कुछ पल तक टिकटों को देखता रहा। अनन्या ने खुशी से उसे गले लगा लिया।

"याद है मैंने प्रॉमिस किया था? जैसे ही वो बड़ी डील फाइनल होगी, हम दोनों वेकेशन पर जाएँगे।"

उसने उत्साह से कहा, "तो कल Friday है... और कल शाम हमारी फ्लाइट है। Be ready!"

रोहन के चेहरे पर मुस्कान आ गई। लेकिन यह मुस्कान खुशी की नहीं थी। यह राहत की मुस्कान थी। क्योंकि अचानक अनन्या ने खुद ही उसे वह मौका दे दिया था, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी। अगर अनन्या कल शहर से बाहर चली जाती... तो कबीर उससे बात नहीं कर पाता। वह शेयर ट्रांसफर रोक नहीं पाती। और बोर्ड की मंज़ूरी मिलने तक रोहन के पास अपना काम पूरा करने का समय होता। रोहन ने अनन्या को गले लगाते हुए कहा, -"तुम सच में मुझे सरप्राइज़ करने में एक्सपर्ट हो।"

"तो फिर कल कोई बहाना नहीं चलेगा।"

"कोई बहाना नहीं।"

लेकिन रोहन के दिमाग में अब एक नई योजना आकार ले चुकी थी।

...

उन दोनों को इतना करीब देखकर निशा के चेहरे पर मुस्कान गायब हो चुकी थी। उसके हाथ में पकड़ी चम्मच पर उसकी पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही थी। उसकी आँखों में जलन साफ़ दिखाई दे रही थी। कुछ सेकंड बाद चम्मच उसके हाथ में हल्का-सा मुड़ गया। फिर उसने अचानक उसे प्लेट में फेंक दिया।

छन्न!

अनन्या और रोहन दोनों उसकी तरफ देखने लगे। निशा एक पल के लिए घबरा गई।

"वो... वो मेरे हाथ से स्लिप हो गई।"

उसने जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कहा, -  "By the way... congratulations तुम दोनों को। अच्छे से एन्जॉय करना। दो दिन के लिए ही तो जा रहे हो।"

अनन्या ने बस मुस्कुराकर सिर हिला दिया।

"Thanks."

लेकिन निशा के चेहरे पर अब मुस्कान नहीं थी। वह कुर्सी से उठी।

"मैं थोड़ी थक गई हूँ। अपने कमरे में जा रही हूँ।"

"गुड नाइट।"- अनन्या ने कहा।

निशा बिना जवाब दिए वहाँ से चली गई। कुछ देर बाद अनन्या अपने स्टडी रूम में चली गई। रोहन घर के पीछे बने गार्डन एरिया में आ गया। कुछ सेकंड बाद निशा भी चुपचाप उसके पीछे पहुँच गई।

"तुमने उसे रोकने की कोशिश क्यों नहीं की?"

रोहन ने उसकी तरफ देखा।

"किस बात के लिए?"

"ये Bali trip..." निशा की आवाज़ में गुस्सा था। "अगर वो कल चली गई तो?"

रोहन ने  हल्की मुस्कान दी- "यही तो मैं चाहता हूँ।"

निशा चुप हो गई। रोहन ने धीमे स्वर में कहा,

"कबीर उससे मिलने आ रहा है।"

निशा के चेहरे का रंग बदल गया।

"हाँ ..तो?"

"शायद उसे कुछ पता चल चुका है।"

"उसे रोकना होगा "

रोहन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

"हाँ, कबीर को चाहे कुछ पता चला हो या ना , उसका अनन्या से बात करना हमारे लिए खतरा हो सकता है!  अगर कबीर ने शेयर ट्रांसफर की सच्चाई उसे बता दी, तो हमारा पूरा खेल खत्म हो जाएगा।"

निशा ने घबराकर पूछा,

"और अगर वो Bali चली गई....तो ?"

"तो हमारे पास समय होगा।"

रोहन की आवाज़ अब बेहद शांत थी।

"जब तक वो वापस आएगी, तब तक बोर्ड की मंज़ूरी हो चुकी होगी। शेयर ट्रांसफर पूरा हो जाएगा। उसके बाद वो चाहे जितना चिल्लाए... कुछ नहीं बदलेगा।"

निशा ने राहत की साँस ली।

"लेकिन कबीर?"

रोहन कुछ सेकंड चुप रहा। फिर उसकी आँखें ठंडी हो गईं।

"उसकी चिंता मत करो।"

निशा उसे देखती रही- "तुमने क्या किया है?"

रोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।

बस इतना कहा—

"कल तक सब ठीक हो जाएगा। और तुम बस उतना करना जितना मेने समझाया है, और कोई भी गलती की गुंजाईश नहीं है, बस ये 2 दिन , और सब हमारा!!"

...

उधर शहर के दूसरे हिस्से में कबीर अपनी कार चला रहा था। उसके पास एक फाइल थी।

उसी फाइल में वह डॉक्यूमेंट था, जिसने उसके शक को यकीन में बदल दिया था।

उसने फोन पर अनन्या का आखिरी मैसेज देखा।

"Okay. Come at my place. We will talk."

कबीर ने गहरी साँस ली- "आज उसे सब सच बताना होगा। उसकी दोस्त और उसका पति मिलकर उसकी कंपनी को हथियाना चाहते हैं, अगर टाइम पर उन्हें नहीं रोका तो न जाने वो क्या करेंगे!"

उसने कार की स्पीड थोड़ी बढ़ा दी।

उसे नहीं पता था कि कुछ किलोमीटर आगे उसकी राह में एक दूसरी कहानी उसका इंतज़ार कर रही थी।

...

रात के करीब साढ़े दस बजे... एक सुनसान सड़क पर एक काली SUV काफी देर से खड़ी थी। उसकी हेडलाइट बंद थी।अंदर बैठे दो लोग सड़क की तरफ देख रहे थे। एक ने घड़ी देखी।

"यही रास्ता है?"

दूसरे ने मोबाइल स्क्रीन पर कबीर की कार की तस्वीर देखी।

"हाँ।"

कुछ मिनट बाद दूर से एक कार की हेडलाइट दिखाई दी।

"वही है।"

SUV का इंजन स्टार्ट हुआ।

...

कबीर को पीछे से आती गाड़ी का अंदाज़ा नहीं था। उसका ध्यान सिर्फ़ अनन्या के घर पहुँचने पर था। अचानक पीछे वाली SUV ने अपनी स्पीड बढ़ा दी। कबीर ने रियर-व्यू मिरर में देखा।

"ये इतनी तेज़ क्यों आ रही है?"

उसने कार को थोड़ा साइड किया। लेकिन SUV भी उसी तरफ आ गई। कबीर ने ब्रेक लगाया। अगले ही पल...

धड़ाम!

एक जोरदार टक्कर हुई। कबीर की कार बुरी तरह हिल गई। उसने स्टीयरिंग संभालने की कोशिश की। लेकिन दूसरी टक्कर पहले से भी ज्यादा तेज़ थी। कार सड़क से बाहर निकल गई। कुछ सेकंड तक सिर्फ़ टायरों की चीख सुनाई दी।

फिर... कार बैरियर तोड़ती हुई पहाड़ी के किनारे से नीचे जा गिरी। अंधेरे में उसकी लाल टेल लाइट कुछ पल दिखाई दी... और फिर सब कुछ शांत हो गया।

...

क्रमशः...

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