
रात का वह दृश्य कबीर मल्होत्रा के दिमाग से निकल ही नहीं रहा था।
कुछ दिन पहले शहर के उस सुनसान कैफ़े में उसने अनजाने में रोहन और निशा की बातचीत के कुछ हिस्से सुन लिए थे। पूरी बात तो उसके कानों तक नहीं पहुँची थी, लेकिन "कंपनी", "सब हमारा होगा" और "अब अगला कदम" जैसे शब्द उसके मन में लगातार घूम रहे थे। उस समय उसने खुद को समझा लिया था कि शायद वह किसी बिज़नेस डील की बात होगी।
लेकिन उसके बाद जो हुआ, उसने उसके शक को और गहरा कर दिया।
उसी शाम वह एक क्लाइंट से मिलने पाँच सितारा होटल पहुँचा था। मीटिंग खत्म होने के बाद उसने रोहन को एक रूम से निकलते हुए देखा और थोड़ा और पता लगाने के बाद उसे पता चल गया की वो निशा के साथ था!
कबीर ठिठक गया।
उसके मन में पहला सवाल यही उठा—
"अगर रोहन अपनी पत्नी से इतना प्यार करता है, तो इस समय वह अपनी पत्नी की सबसे अच्छी दोस्त के साथ होटल में क्या कर रहा है?"
उसने खुद को फिर समझाने की कोशिश की।
"शायद कोई बिज़नेस मीटिंग हो... या फिर कोई सरप्राइज़ प्लान कर रहे हों।"
लेकिन उसके मन का दूसरा हिस्सा मानने को तैयार नहीं था।
दो दिन पहले कैफ़े...
आज होटल...
और दोनों बार अनन्या कहीं भी नहीं थी।
यह सिर्फ़ संयोग नहीं हो सकता था।
...
आज भी कबीर हमेशा की तरह ऑफिस पहुँचा, लेकिन आज उसका ध्यान अपने काम पर बिल्कुल नहीं था।
वह कंपनी का लीगल एडवाइज़र था। पिछले पाँच वर्षों से वह अनन्या के साथ काम कर रहा था। उसने अपनी आँखों से देखा था कि कैसे एक साधारण लड़की ने मेहनत और ईमानदारी के दम पर करोड़ों की कंपनी खड़ी कर दी।
अनन्या उसके लिए सिर्फ़ एक क्लाइंट नहीं थी।
वह एक ऐसी इंसान थी, जिसका सम्मान पूरा स्टाफ़ करता था।
कबीर ने मन ही मन फैसला किया—
"अगर मेरा शक गलत है तो सबसे ज़्यादा खुशी मुझे होगी... लेकिन अगर सही निकला, तो मैं चुप नहीं बैठूँगा।"
उसी समय उसकी नज़र काँच के केबिन की तरफ़ गई।
अंदर रोहन बैठा था।
वह कंपनी के कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ देख रहा था।
अनन्या सामने बैठी थी और बिना किसी झिझक के हर फाइल उसके सामने रख रही थी।
दोनों हँसते हुए किसी बात पर चर्चा कर रहे थे।
बाहर से देखने पर सब कुछ सामान्य लग रहा था।
लेकिन अब कबीर हर छोटी चीज़ को अलग नज़र से देखने लगा था।
...
दोपहर में एक बोर्ड मीटिंग रखी गई।
कबीर भी उसमें मौजूद था।
मीटिंग के दौरान उसने गौर किया कि पिछले कुछ दिनों से एक बदलाव लगातार हो रहा है।
पहले हर महत्वपूर्ण फैसला सिर्फ़ अनन्या लेती थी।
अब लगभग हर निर्णय से पहले वह रोहन की तरफ़ देखती।
कभी उसकी राय पूछती...
कभी उसकी सहमति का इंतज़ार करती।
यह बदलाव बहुत छोटा था, लेकिन एक अनुभवी वकील की नज़र से नहीं बच सकता था।
मीटिंग खत्म होने के बाद सभी लोग बाहर निकल गए।
कबीर जानबूझकर कुछ देर वहीं रुक गया।
उसे उम्मीद थी कि शायद उसे कुछ ऐसा देखने या सुनने को मिल जाए, जो उसके शक को दिशा दे सके।
तभी उसने देखा कि रोहन चुपचाप CFO के केबिन की तरफ़ जा रहा है।
कबीर भी थोड़ी दूरी बनाकर उसके पीछे चल पड़ा।
केबिन का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ था।
अंदर से धीमी आवाज़ें आ रही थीं।
"बाकी फाइलें भी जल्दी मेरे पास आ जानी चाहिए।"
यह रोहन की आवाज़ थी।
CFO ने धीरे से कहा,
"लेकिन मैम अगर पूछेंगी तो...?"
रोहन हँस पड़ा।
"वो नहीं पूछेंगी। जितना मैं कहूँ, उतना ही करना।"
इसके बाद आवाज़ें और धीमी हो गईं।
कबीर पूरी बात नहीं सुन पाया।
लेकिन इतना ज़रूर समझ गया कि कुछ न कुछ ऐसा चल रहा है, जो सामान्य नहीं है।
उसके चेहरे की गंभीरता और बढ़ गई।
...
शाम को कबीर सीधे घर नहीं गया।
वह अपने पुराने दोस्त और साइबर एक्सपर्ट अमन के ऑफिस पहुँचा।
अमन ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए पूछा,
"आज बड़े परेशान लग रहे हो।"
कबीर कुर्सी पर बैठ गया।
"मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।"
"किस मामले में?"
कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला,
"मुझे किसी का पास्ट जानना है।"
अमन हँस पड़ा।
"तू वकील है या जासूस?"
कबीर ने भी हल्की मुस्कान दी।
"आज शायद दोनों बनना पड़ेगा।"
उसने रोहन और निशा के बारे में जितना जानता था, सब अमन को बता दिया।
अमन का चेहरा भी गंभीर हो गया।
"अगर तेरा शक सही है, तो मामला बहुत बड़ा हो सकता है।"
"मुझे किसी की निजी ज़िंदगी में दखल देने का शौक नहीं है, अमन। लेकिन अगर कोई अनन्या या उसकी कंपनी के खिलाफ़ कुछ कर रहा है, तो मुझे सच जानना ही होगा।"
अमन ने कंप्यूटर ऑन किया।
"ठीक है। मैं जो जानकारी पब्लिक रिकॉर्ड से मिल सकती है, वह निकालने की कोशिश करता हूँ।"
कबीर ने सिर हिला दिया।
उसे पता था कि यह रास्ता आसान नहीं होगा।
...
उधर उसी समय रोहन अपनी कार में बैठा किसी से फोन पर बात कर रहा था।
"हाँ... अभी तक सब ठीक चल रहा है।"
फोन के दूसरी तरफ़ निशा थी।
"अनन्या को कुछ शक तो नहीं हुआ?"
"उसे? बिल्कुल नहीं।"
रोहन हँसते हुए बोला।
"वो तो आज भी हर फाइल मेरी राय पूछकर साइन कर रही थी। हम बिलकुल सही जा रहे हैं, बस एक बार वो साइनिंग ऑथोरिटी मेरे नाम कर दे तो उसके बाद हमे उसकी जरूरत नहीं है "
निशा की आवाज़ में संतोष था।
"अच्छा है। लेकिन सावधान रहना। मुझे लगता है कही हम जल्दबाज़ी में कोई गड़बड़ न कर दें "
रोहन कुछ पल के लिए चुप हो गया।
"तुम बिलकुल चिंता मत करो, अनन्या मुझपर कभी शक नहीी करेगी "
फोन कट गया।
रोहन की आँखों में इस बार प्यार नहीं...
सिर्फ़ ठंडापन था।
...
अगले दिन सुबह अमन का फोन आया।
"कबीर, तुरंत मेरे ऑफिस आ।"
कबीर बिना समय गंवाए वहाँ पहुँच गया।
अमन ने कंप्यूटर स्क्रीन उसकी तरफ़ घुमाई।
"ये देख।"
स्क्रीन पर रोहन और निशा की कॉलेज की एक पुरानी ग्रुप फोटो थी।
पहली नज़र में सब सामान्य लग रहा था।
लेकिन फिर अमन ने दूसरी तस्वीर खोली।
इस बार तस्वीर में सिर्फ़ रोहन और निशा थे।
दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए मुस्कुरा रहे थे।
तस्वीर के नीचे तारीख़ लिखी थी।
यह वही समय था, जब अनन्या भी उसी कॉलेज में पढ़ती थी।
कबीर की भौंहें सिकुड़ गईं।
"मतलब... ये दोनों पहले से एक-दूसरे को जानते थे।"
"सिर्फ़ जानते नहीं थे।"
अमन ने तीसरी तस्वीर खोली।
इस बार तस्वीर किसी कॉलेज फेस्ट की थी।
रोहन ने निशा के कंधे पर हाथ रखा हुआ था।
दोनों बेहद करीब दिखाई दे रहे थे।
अमन बोला,
"सोशल मीडिया से ज़्यादातर तस्वीरें डिलीट कर दी गई थीं। लेकिन इंटरनेट सब कुछ पूरी तरह नहीं भूलता।"
कबीर अब समझ चुका था कि उसका शक बेवजह नहीं था। रोहन और निशा काफी क्लोज थे फिर इन दोनों ने इस बात को छुपा कर क्यों रखा है ?
ये तस्वीरें किसी अपराध का सबूत नहीं थीं, उसे और जानकारी चाहिए थी।
...
उस शाम ऑफिस में काम खत्म होने के बाद अनन्या अकेली अपने केबिन में बैठी कुछ फाइलें देख रही थी।
तभी कबीर ने दरवाज़ा खटखटाया।
"आ सकता हूँ, मैम?"
"हाँ कबीर, आइए।"
कबीर कुछ पल चुप रहा।
उसके मन में कई बार आया कि वह सीधे रोहन और निशा के बारे में बता दे।
लेकिन अगले ही पल उसे याद आया—
उसके पास अभी सिर्फ़ शक था...सबूत नहीं। और रोहन और निशा के अतीत के बारे में अनन्या को शयद पता हो या रोहन और निशा को अगर पता चला की में उसपर शक कर रहा हूँ तोह वो और भी सतर्क हो सकते है!
और अगर उसने अभी किसी भी चीज की संभावना भी अनन्या को बताई और रोहन से ही सतर्क रहने को कहा, तो हो सकता है अनन्या उसी पर विश्वास न करे।
इसलिए उसने खुद को रोक लिया।
"मैम, मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि अगले कुछ दिनों तक कंपनी के किसी भी बड़े दस्तावेज़ पर साइन करने से पहले मुझे एक बार ज़रूर दिखा दीजिएगा।"
अनन्या मुस्कुराई।
"तुम तो हमेशा देखते ही हो।"
"इस बार थोड़ा ज़्यादा ध्यान से देखूँगा।"
"कोई खास वजह?"
कबीर ने एक पल के लिए रोहन के केबिन की तरफ़ देखा, फिर बोला—
"बस... एहतियात के तौर पर।"
अनन्या ने बिना ज़्यादा सोचे सिर हिला दिया।
"ठीक है।"
कबीर बाहर निकल आया।
उसने मन ही मन एक फैसला कर लिया था।
"जब तक मुझे पूरा सच नहीं मिल जाता... मैं अनन्या पर एक आँच भी नहीं आने दूँगा। और अगर ये सिर्फ निशा और रोहन का अफेयर है तो में अनन्या को बहुत जल्द इनकी सचाई जरूर दिखाऊंगा "
लेकिन उसे यह नहीं पता था...
कि जिस खेल को वह समझने की कोशिश कर रहा था, उसके खिलाड़ी उससे कई कदम आगे थे।
...
उसी रात...
रोहन अपने स्टडी रूम में बैठा कुछ कागज़ देख रहा था।
अचानक उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर एक अनजान नंबर चमक रहा था।
उसने कॉल रिसीव की।
दूसरी तरफ़ से सिर्फ़ एक वाक्य सुनाई दिया—
"तुम्हारे अतीत को खोदा जा रहा है, जरा संभलकर !"
इसके बाद कॉल तुरंत कट गया।
रोहन कुछ सेकंड तक मोबाइल को देखता रहा।
फिर उसके होंठों पर एक बेहद हल्की, लेकिन खतरनाक मुस्कान उभरी।
"तो... खेल में एक नया खिलाड़ी भी उतर चुका है।"
उसने धीरे से कहा।
और पहली बार...उसकी आँखे काफी खतरनाक लग रही थी!
क्रमशः...




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