
सुबह की हल्की बारिश ने पूरे शहर के मौसम को सुहाना बना दिया था। आसमान में बादल छाए हुए थे और काँच की ऊँची इमारतों पर गिरती बारिश की बूँदें किसी खूबसूरत तस्वीर जैसी लग रही थीं। लेकिन अनन्या के लिए यह दिन बाकी दिनों से अलग नहीं था। उसके सामने फाइलों का ढेर था, लगातार मीटिंग्स थीं और नए प्रोजेक्ट्स की ज़िम्मेदारियाँ उसका इंतज़ार कर रही थीं।
अनन्या कल रोहन से हुई बात को सोचकर थोड़ा परेशान थी लेकिन उसे पूरी उम्मीद थी की रोहन इस छोटी सी बात से ज्यादा एफेक्ट नहीं होगा क्यूंकि वो अनन्या और उसकी जिम्मेदारियों को अच्छे से समझने वाला एक आदर्श पति है!
ऑफिस पहुँचते ही मीरा ने दिनभर का शेड्यूल उसके सामने रख दिया।
"मैम, ग्यारह बजे विदेशी क्लाइंट के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस है, उसके बाद बोर्ड की मीटिंग और शाम तक तीन इंटरनल रिव्यू।"
अनन्या ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
"ठीक है, सब समय पर कर लेते हैं।"
इतने में रोहन हाथ में कॉफी लेकर उसके केबिन में आया।
"मैडम, आज भी नाश्ता छोड़ दिया होगा?"
अनन्या मुस्कुरा दी। उसने जैसा सोचा था बिलकुल वैसे ही आज भी रोज की तरह उसकी केयर कर रहा था!
अनन्या- "तुम्हें कैसे पता?"
रोहन- "क्योंकि मैं तुम्हें सबसे ज़्यादा जानता हूँ।"
उसने कॉफी का कप अनन्या की तरफ़ बढ़ाया। बाहर से देखने पर वह एक ऐसा पति लगता था, जो अपनी पत्नी की हर छोटी-बड़ी बात का ख़याल रखता हो। ऑफिस के कई कर्मचारी उन्हें देखकर मुस्कुरा देते थे। सबके मन में यही बात थी कि अनन्या जितनी सफल है, उतनी ही भाग्यशाली भी है।
दिन की सारी मीटिंग्स उम्मीद से बेहतर रहीं। एक और बड़ा कॉन्ट्रैक्ट कंपनी के नाम हो गया। शाम तक सब लोग खुश थे, लेकिन लगातार काम करने की वजह से अनन्या के सिर में हल्का दर्द होने लगा।
मीरा ने चिंता से पूछा, "मैम, अगर आप चाहें तो बाकी काम कल देख सकती हैं।"
अनन्या ने गहरी साँस ली।
"शायद तुम सही कह रही हो। आज थोड़ा जल्दी घर चली जाती हूँ।"
कई महीनों बाद ऐसा हुआ था कि वह शाम ढलने से पहले घर लौट रही थी।
...
घर पहुँचते ही उसे एक अजीब-सी शांति महसूस हुई। रोहन किसी बिज़नेस मीटिंग के बहाने बाहर गया हुआ था। बड़ा-सा बंगला आज असामान्य रूप से शांत था। कभी-कभी इंसान भीड़ में रहकर भी अपने अतीत की ओर खिंच जाता है, और शायद आज अनन्या के साथ भी कुछ ऐसा ही होने वाला था।
वह अपने कमरे की बालकनी में कुछ देर बारिश देखती रही। ठंडी हवा के साथ बचपन की कई यादें उसके मन में तैरने लगीं। उसे अपना छोटा-सा घर याद आया, जहाँ उसके पिता शाम को चाय पीते हुए उससे कहा करते थे—
"बेटा, मेहनत करने वाले इंसान को मंज़िल देर से मिलती है, लेकिन मिलती ज़रूर है।"
उनकी वही मुस्कान आज भी उसकी आँखों के सामने बिल्कुल साफ़ थी।
अनन्या के पिता को गुज़रे हुए कई साल हो चुके थे, लेकिन उनकी बातें आज भी उसके लिए किसी मार्गदर्शक की तरह थीं।
अचानक उसकी नज़र स्टोर रूम की तरफ़ चली गई। कई महीनों से उसने उस कमरे का दरवाज़ा तक नहीं खोला था। वहाँ उसके माता-पिता का पुराना सामान रखा था।
न जाने क्यों आज उसका मन उस कमरे में जाने का हुआ।
दरवाज़ा खुलते ही हल्की-सी मिट्टी और पुराने कागज़ों की खुशबू हवा में फैल गई। दीवार के किनारे लकड़ी के कुछ बक्से रखे थे। एक कोने में पुरानी साइकिल थी, जिसे उसके पिता बहुत संभालकर रखते थे। पास ही एक पुरानी सिलाई मशीन रखी थी, जिस पर उसकी माँ देर रात तक काम किया करती थीं।
अनन्या धीरे-धीरे हर चीज़ को हाथ लगाकर देख रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने अतीत को छू रही हो।
एक बक्से में पुराने एल्बम रखे थे।
उसने पहला एल्बम खोला।
पहली तस्वीर में वह लगभग दस साल की थी। पिता ने उसे अपने कंधों पर बैठाया हुआ था और दोनों ज़ोर से हँस रहे थे।
दूसरी तस्वीर उसके स्कूल के पहले दिन की थी।
तीसरी तस्वीर में उसकी माँ उसके जन्मदिन का केक काट रही थीं।
तस्वीरें देखते-देखते उसकी आँखें नम हो गईं।
"काश... आप दोनों आज होते।"
उसके होंठों से धीरे-से निकला।
उसी समय एल्बम के नीचे रखा एक छोटा-सा भूरे रंग का चमड़े का कवर उसकी नज़र में आया।
वह एक पुरानी डायरी थी।
उस पर धूल जमी हुई थी और किनारे समय के साथ घिस चुके थे।
डायरी के पहले पन्ने पर उसके पिता की राइटिंग थी।
"रमेश शर्मा – पर्सनल डायरी "
अनन्या के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
"पापा भी डायरी लिखा करते थे...?"
उसने बड़े ध्यान से पहला पन्ना खोला।
उसमें रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातें लिखी थीं। कहीं घर के खर्च का हिसाब, कहीं अनन्या की पढ़ाई की चिंता, तो कहीं उसके भविष्य के सपने।
एक पन्ने पर लिखा था—
"आज अनन्या ने पहली बार कहा कि वह बड़ी होकर अपनी कंपनी बनाएगी। लोग हँसे, लेकिन मुझे यकीन है कि मेरी बेटी एक दिन बहुत आगे जाएगी।"
यह पढ़कर अनन्या की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उसे याद आया कि उस दिन पूरे मोहल्ले के लोगों ने उसके सपने का मज़ाक उड़ाया था, लेकिन उसके पिता ने कभी उसका विश्वास नहीं टूटने दिया।
वह आगे के पन्ने पलटती रही।
हर पन्ने में एक पिता का अपनी बेटी के लिए प्यार झलक रहा था।
कभी मेहनत की सीख...
कभी ईमानदारी की बात...
कभी इंसानों को पहचानने की सलाह।
अचानक आख़िरी हिस्से के पास एक पन्ने पर उसकी नज़र ठहर गई।
उस पन्ने पर सिर्फ़ एक ही पंक्ति लिखी थी।
"हर मुस्कुराने वाला अपना नहीं होता।"
बस... इतना ही।
न उसके नीचे कोई तारीख़ थी।
न कोई नाम।
न कोई वजह।
अनन्या कुछ पल तक उस वाक्य को देखती रही।
उसने धीरे से खुद से कहा—
"पापा ने ये किसके लिए लिखा होगा?"
उसने अगले पन्ने पलटे, लेकिन वे खाली थे।
डायरी यहीं खत्म हो जाती थी।
एक अजीब-सा सन्नाटा पूरे कमरे में फैल गया।
कुछ सेकंड के लिए उसके मन में एक अनजानी बेचैनी हुई। उसे लगा जैसे इस एक पंक्ति के पीछे कोई अधूरी कहानी छिपी हो।
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को समझाया।
"शायद किसी सामान्य अनुभव के बारे में लिखा होगा। हर इंसान अपनी ज़िंदगी में ऐसे लोगों से मिलता है।"
वह हल्का-सा मुस्कुराई और डायरी बंद कर दी।
उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि यही एक पंक्ति आने वाले समय में उसकी पूरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच साबित होने वाली है।
इतने में बाहर मुख्य दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई।
रोहन वापस आ चुका था।
"अनन्या... कहाँ हो?"
उसकी आवाज़ पूरे घर में गूँज गई।
अनन्या डायरी हाथ में लेकर बाहर आई।
रोहन ने मुस्कुराते हुए पूछा,
"अरे, आज स्टोर रूम की सफाई चल रही है क्या?"
"नहीं... बस पापा की कुछ पुरानी चीज़ें देख रही थी।"
"कुछ मिला?"
अनन्या ने डायरी उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
"पापा की डायरी मिली है।"
रोहन ने डायरी हाथ में ली। उसने ऊपर से दो-तीन पन्ने देखे और सामान्य चेहरा बनाकर वापस लौटा दी।
"अच्छी यादें हैं... संभालकर रखना।"
उसकी आवाज़ बिल्कुल सामान्य थी।
लेकिन जब अनन्या पानी लेने के लिए किचन में गई, उसी क्षण रोहन के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
उसने एक पल के लिए मुड़कर डायरी की तरफ़ देखा।
उसकी आँखों में एक हल्की-सी घबराहट चमकी।
मानो उसे डर हो कि कहीं उस डायरी में ऐसा कुछ न लिखा हो, जो कभी सामने नहीं आना चाहिए।
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।
"नहीं... अगर कुछ होता, तो वह अभी तक पढ़ चुकी होती।"
उसने मन ही मन कहा और सोफ़े पर बैठ गया।
कुछ देर बाद दोनों साथ बैठकर चाय पीने लगे।
अनन्या अब भी अपने पिता की बातें याद करके भावुक थी।
रोहन उसे दिलासा देता रहा, उसके आँसू पोंछता रहा और बार-बार यही कहता रहा—
"तुम्हारे पापा जहाँ भी होंगे, आज तुम्हें देखकर बहुत गर्व महसूस करते होंगे।"
अनन्या ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दी।
उसे लगा कि दुनिया में उससे ज़्यादा अपना कोई नहीं है।
लेकिन किस्मत शायद चुपचाप मुस्कुरा रही थी।
क्योंकि उसी घर में एक इंसान ऐसा भी बैठा था, जो उसके भरोसे की नींव धीरे-धीरे खोखली कर रहा था।
उसी रात...
जब अनन्या गहरी नींद में सो चुकी थी, रोहन चुपचाप बिस्तर से उठा। उसने यह सुनिश्चित किया कि अनन्या सो रही है। फिर बिना आवाज़ किए स्टोर रूम की तरफ़ बढ़ गया।उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई।
वही बक्सा...
वही डायरी...
सब कुछ अपनी जगह रखा था।
रोहन ने धीरे से डायरी उठाई।
उसने सीधे आख़िरी पन्ने खोले।
कुछ सेकंड तक वह उस एक पंक्ति को घूरता रहा—
"हर मुस्कुराने वाला अपना नहीं होता।"
उसके चेहरे पर इस बार मुस्कान नहीं थी। सिर्फ़ गहरी सोच थी।
वह फुसफुसाया—
"क्या आपको किसी बात का पता चल गया था... अंकल?"
उसी क्षण पीछे से लकड़ी के दरवाज़े में हल्की-सी चरमराहट हुई।
रोहन बिजली की तरह पलटा।
दरवाज़े के बाहर...
जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से हटकर गया हो। उसका दिल एक पल के लिए तेज़ी से धड़क उठा।
"कौन है वहाँ?"
लेकिन बाहर फिर वही सन्नाटा था...
और उस सन्नाटे ने पहली बार रोहन के मन में भी डर पैदा कर दिया।




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