
कैफ़े के बाहर खड़ा वह साया कुछ पल तक बिल्कुल स्थिर रहा। रोहन और निशा की साँसें जैसे थम गईं।
निशा ने घबराकर फुसफुसाते हुए पूछा,
"क...कौन है वहाँ?"
लेकिन बाहर से कोई जवाब नहीं आया। रोहन तुरंत कुर्सी से उठा और तेज़ कदमों से दरवाज़े की ओर बढ़ा। उसने झटके से काँच का दरवाज़ा खोला।
बाहर... कोई नहीं था।
सिर्फ़ ठंडी हवा चल रही थी और ज़मीन पर एक कॉफ़ी का खाली कप लुढ़कता हुआ दूर जा रहा था। रोहन ने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई।
सड़क लगभग सुनसान थी।
दूर एक बुज़ुर्ग चौकीदार अपनी टॉर्च लेकर चक्कर लगा रहा था।
रोहन वापस अंदर आया।
"कोई नहीं था... शायद हमारा वहम था।"
लेकिन निशा का चेहरा अब भी डरा हुआ था। उसे एक अनजाने खतरे की आहट सुनाई दे रही थी!
"अगर किसी ने हमारी बातें सुन लीं तो?"
रोहन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"घबराने की ज़रूरत नहीं। अब तक अनन्या को हम पर इतना भरोसा है कि अगर कोई सच भी बता दे... तब भी वो उसी इंसान को झूठा समझेगी।"
निशा के चेहरे पर फिर वही मुस्कान लौट आई।
"वैसे भी... कुछ ही दिनों की बात है।"
रोहन ने धीरे से कहा- "इस बार कोई गलती नहीं होनी चाहिए।"
निशा - "नहीं होगी।"
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा...निशा ने रोहन का हाथ थोड़ा और कस कर पकड़ा दोनों ने एक दुसरे की आँखों में देखा और फिर बिना कुछ बोले कैफ़े से निकल गए।
...
उसी समय...
कैफ़े से लगभग पचास मीटर दूर एक कार खड़ी थी। ब्लैक कलर की एक लुक्सुरियस कार जिसकी ड्राइविंग सीट वाली विंडो का मिरर अभी खुला था !
ड्राइविंग सीट पर बैठा एक युवक अपने मोबाइल की स्क्रीन देख रहा था।उसके चेहरे पर उलझन साफ़ दिखाई दे रही थी।
उसका नाम था कबीर मल्होत्रा।
वह अनन्या की कंपनी में लीगल एडवाइज़र था।
आज उसकी यहाँ आने की कोई योजना नहीं थी। असल में वह अपने एक क्लाइंट से मिलने आया था, लेकिन क्लाइंट के न आने पर वह वापस जाने ही वाला था कि तभी उसकी नज़र रोहन और निशा पर पड़ गई। उसे हैरानी इसलिए हुई क्योंकि दोनों ने उसे देखा ही नहीं।
कबीर ने अनजाने में उनकी कुछ बातें सुन ली थीं।
"...उसकी पूरी कंपनी..."
"...सब हमारा होगा..."
बस इतने ही शब्द उसके कानों तक पहुँचे थे।
पूरी बात वह नहीं सुन पाया था।
उसने गहरी साँस ली।
"क्या मैं ज़्यादा सोच रहा हूँ... या सच में कुछ गड़बड़ है?"
कुछ देर सोचने के बाद उसने सिर झटक दिया।
"नहीं... शायद कोई बिज़नेस की बात होगी।"
उसने कार स्टार्ट की और वहाँ से चला गया।
लेकिन उसके मन में एक छोटा-सा शक जन्म ले चुका था।
...
अगली सुबह...
अनन्या हमेशा की तरह जल्दी ऑफिस पहुँच गई।
आज एक विदेशी कंपनी के साथ कई सौ करोड़ की डील साइन होनी थी। पूरा ऑफिस उत्साह से भरा हुआ था।मीरा फ़ाइलें तैयार कर रही थी।
"मैम, सारी लीगल डॉक्यूमेंट्स तैयार हैं।"
"गुड।"
अनन्या ने मुस्कुराकर कहा।
तभी रोहन भी ऑफिस पहुँच गया।
उसके हाथ में अनन्या की पसंदीदा कॉफ़ी थी।
"मैडम... आपकी सुबह बिना कॉफ़ी के कैसे शुरू हो सकती है?"
ऑफिस के कर्मचारी दोनों को देखकर मुस्कुरा रहे थे।
हर किसी को लगता था...
दुनिया में इससे बेहतर पति शायद ही कोई होगा।
रोहन ने प्यार से कप उसके सामने रखा।
"आज की डील के लिए ऑल द बेस्ट।"
"थैंक यू।"
अनन्या ने बिना किसी शक के कॉफ़ी पी ली।
रोहन उसे देखते हुए मुस्कुराता रहा।
लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था।
*"बहुत जल्द... सब बदलने वाला है ।"
अनन्या ने रोहन की तरफ देखा- "तुमने कुछ कहा?"
रोहन सकपका गया फिर खुद को सँभालते हुए बोला, "नहीं ...नहीं तो! तुमने कुछ सुना?"
अनन्या ने मुस्कुराते हुए रोहन को गले लगाया और बोली- "आईएम सॉरी रोहन, मुझे पता है मे तुम्हेँ ठीक से टाइम नहीं दे पा रही हूँ, तुम तो मेरे बिना बोले सब समझ जाते हो, आईएम सो लकी कि मुझे तुम्हारे जैसा लाइफ पार्टनर मिला! बस ये डील हो जाये उसके बाद हम पक्का कही घूमने जायेंगे!"
रोहन ने भी अनन्या के बाल सहलाते हुए उसे थोड़ा प्यार किया उसके बाद अनन्या मीटिंग रूम की तरफ चली गयी!
...
दोपहर...
मीटिंग सफल रही।
विदेशी कंपनी ने डील साइन कर दी।
पूरा बोर्डरूम तालियों से गूँज उठा।
अनन्या की कंपनी ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली थी।
सब लोग खुश थे...
सिवाय दो लोगों के।
रोहन...और निशा।
शाम को दोनों फिर फ़ोन पर बात कर रहे थे।
निशा ने झुंझलाकर कहा,
"ये लड़की हर दिन और ज़्यादा ताक़तवर होती जा रही है।"
रोहन की आवाज़ ठंडी थी।
"इसलिए अब हमें जल्दी करनी होगी।"
"पहला कदम?"
"पहले उसके भरोसे को जीतो .."
"फिर उसकी कंपनी..."
"...और आखिर में..."
रोहन कुछ सेकंड के लिए रुका।
उसकी आँखों में एक ख़तरनाक चमक उभरी।
"अनन्या।"
फोन के दूसरी तरफ़ कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
फिर निशा ने धीरे से कहा,
"समझ गई। पर प्लीज आज तुम टाइम से आजाना मुझे तुम्हारी बहोत याद आ रही है आज, होटल ब्लू मून में ठीक 10 baje!"
...
उसी शाम...
अनन्या अपने केबिन में अकेली बैठी कुछ फ़ाइलें देख रही थी।
तभी उसके मोबाइल पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।
> "किसी पर भी इतना भरोसा मत करना कि किसी पर भरोसा करने के लायक ही न रहो"!
अनन्या कुछ पल तक स्क्रीन को देखती रह गई।
उसके माथे पर हल्की-सी शिकन उभरी।
"ये किसने भेजा?"
उसने तुरंत उस नंबर पर कॉल मिलाई।
लेकिन...
फोन स्विच ऑफ़ था।
अनन्या ने दोबारा मैसेज पढ़ा।
फिर हल्की-सी मुस्कुराई।
"आजकल लोग भी न... कैसी-कैसी हरकतें करते हैं।"
उसने बिना ज़्यादा सोचे मैसेज डिलीट कर दिया।
उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था...
कि उसने अपनी ज़िंदगी की सबसे ज़रूरी चेतावनी खुद अपने हाथों से मिटा दी थी।
उधर...
एक अँधेरे कमरे में कोई व्यक्ति मोबाइल की स्क्रीन देख रहा था।
उसने गहरी साँस लेते हुए धीरे से कहा,
"मैंने तुम्हें बचाने की कोशिश की, अनन्या..."
"...अब आगे तुम्हारी किस्मत।"
उसका चेहरा अब भी अँधेरे में छिपा हुआ था।
लेकिन उसकी आवाज़ में डर भी था...
और किसी पुराने दर्द की झलक भी।




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