
सुबह की हल्की सुनहरी धूप शहर की सबसे ऊँची इमारतों में से एक की काँच की दीवारों पर पड़ रही थी। नीचे सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन इमारत की सबसे ऊपर वाली मंज़िल पर बने आलीशान केबिन के भीतर एक अलग ही सन्नाटा था। उस केबिन के बीचोंबीच खड़ी थी अनन्या शर्मा, जो सिर्फ़ तीस साल की उम्र में देश की सबसे तेज़ी से बढ़ती कंपनियों में से एक की मालिक बन चुकी थी।
उसने सामने लगी काँच की दीवार से पूरे शहर की ओर देखा। कभी यही शहर उसे डराता था। छोटे शहर की एक साधारण लड़की, जिसके पास सपने तो बहुत थे, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए कोई सहारा नहीं था। उसने दिन-रात मेहनत करके अपना नाम बनाया था। हर मीटिंग, हर असफलता और हर जीत उसके संघर्ष की गवाह थी।
उसकी सोच को दरवाज़े पर हुई दस्तक ने तोड़ दिया।
"मैम, बोर्ड मीटिंग शुरू होने वाली है।"
उसकी सेक्रेटरी मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा।
अनन्या ने घड़ी देखी और हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
"चलो।"
कॉन्फ्रेंस रूम में कंपनी के बड़े-बड़े डायरेक्टर और इन्वेस्टर्स पहले से बैठे थे। जैसे ही अनन्या अंदर आई, सभी सम्मान में खड़े हो गए।
मीटिंग लगभग एक घंटे तक चली। नए प्रोजेक्ट, विदेशी निवेश और आने वाले विस्तार की योजनाओं पर चर्चा हुई। अंत में कंपनी के मुख्य वित्त अधिकारी ने उत्साहित होकर घोषणा की—
"इस तिमाही में हमारी कंपनी ने पिछले साल की तुलना में पैंतालीस प्रतिशत अधिक मुनाफ़ा कमाया है।"
पूरा कमरा तालियों की आवाज़ से गूँज उठा।
अनन्या ने मुस्कुराकर सभी का धन्यवाद किया, लेकिन उसके चेहरे पर घमंड का एक भी भाव नहीं था। सफलता उसके लिए मंज़िल नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी थी।
मीटिंग खत्म होते ही उसका मोबाइल बजा।
स्क्रीन पर नाम चमका—राहुल... नहीं, रोहन।
उसने तुरंत कॉल उठाई।
"हैलो, मिसेज़ शर्मा..." उधर से रोहन की हँसती हुई आवाज़ आई, "या फिर कहूँ... देश की सबसे बिज़ी बिज़नेसवुमन?"
अनन्या हँस पड़ी।
"आज फिर मेरी टाँग खींच रहे हो?"
"नहीं। बस याद दिला रहा हूँ कि तुम्हारा एक पति भी है, जो दो घंटे से लंच पर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।"
अनन्या ने माथे पर हाथ मारा।
"ओह! मैं तो भूल ही गई। बस बीस मिनट में पहुँच रही हूँ।"
"मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।"
कॉल कट गई।
उसके चेहरे पर अनजाने में मुस्कान आ गई। दुनिया चाहे उसे एक सफल बिज़नेसवुमन के रूप में जानती हो, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ी खुशी उसका परिवार था। खासकर रोहन... जिसने हर मुश्किल वक्त में उसका साथ दिया था। कम से कम वह यही मानती थी।
...
शहर के एक पाँच सितारा होटल में रोहन पहले से बैठा था। महँगा सूट, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान और हाथ में गुलाबों का छोटा-सा गुलदस्ता।
जैसे ही अनन्या अंदर आई, उसने खड़े होकर उसका स्वागत किया।
"मैडम, आपकी सफलता के नाम।"
उसने गुलदस्ता आगे बढ़ाया।
अनन्या हल्का-सा शर्माकर मुस्कुरा दी।
"तुम्हें हर बार ये सब करने की क्या ज़रूरत है?"
"क्योंकि तुम इसकी हकदार हो।"
दोनों साथ बैठ गए।
रोहन पूरे समय अनन्या की पसंद का खाना ऑर्डर करता रहा, उसकी तारीफ़ करता रहा और बार-बार यही कहता रहा कि उसे अपनी पत्नी पर कितना गर्व है।
दूर से देखने वाला कोई भी इंसान यही कहता कि ये एक आदर्श पति है।
लेकिन उसी समय...
रोहन की जेब में रखा मोबाइल वाइब्रेट हुआ।
उसने एक नज़र स्क्रीन पर डाली।
मैसेज था—
"आज शाम मिलना मत भूलना। बहुत ज़रूरी बात करनी है। — N"
उसने बिना कोई जवाब दिए मोबाइल वापस जेब में रख लिया।
अनन्या उस समय मेन्यू देख रही थी। उसकी नज़र उस संदेश पर नहीं गई।
रोहन ने सामान्य चेहरा बनाए रखा।
"क्या सोच रही हो?"
"बस... कभी-कभी लगता है कि भगवान ने मुझे ज़रूरत से ज़्यादा खुशियाँ दे दी हैं।"
रोहन ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।
"तुम सिर्फ़ खुशियाँ डिज़र्व करती हो।"
उसकी आँखों में चिंता, प्यार और अपनापन दिखाई दे रहा था।
कम से कम... ऊपर से। बाकी तोह रोहन की सच्चाई और मन की बात खुद रोहन ही जानता है लेकिन सामने से कोई भी उसे देखकर यही कहेगा की अनन्या वाकई बहोत भाग्यशाली है !
...
शाम को अनन्या सीधे अपने घर नहीं गई।
आज उसकी बचपन की सबसे अच्छी दोस्त निशा कपूर का जन्मदिन था।
दोनों की दोस्ती कॉलेज के दिनों से थी। जब अनन्या के पास फीस भरने के पैसे नहीं होते थे, तब निशा उसका हौसला बढ़ाती थी। जब अनन्या रोती थी, तो निशा उसे हँसाती थी।
कम से कम यही यादें अनन्या के दिल में थीं। अनन्या के ज्यादा दोस्त कभी थे भी नहीं, पर निशा सिर्फ उसकी दोस्त hi नहीं बल्कि बहन जैसी थी! निशा पर बहोत अँधा विश्वास करती है अनन्या!
दरवाज़ा खुलते ही निशा दौड़कर उससे लिपट गई।
"मैडम! अब तो अपॉइंटमेंट लेकर मिलना पड़ता है।"
दोनों ज़ोर से हँस पड़ीं।
"तेरे लिए तो हमेशा टाइम है।"
निशा ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा।
"चल, आज सिर्फ़ दोस्त बनकर रहना। बिज़नेसवुमन नहीं।"
अनन्या भी मुस्कुरा दी, उसे निशा का इस तरह खुद पर हक़ जताना अच्छा लगता था, पूरी शाम हँसी-मज़ाक में गुज़र गई।
निशा बार-बार कहती रही—
"तू दुनिया की सबसे खुशनसीब लड़की है। इतनी बड़ी कंपनी... इतना प्यार करने वाला पति... और मैं जैसी दोस्त।"
अनन्या मुस्कुरा देती।
उसे सच में लगता था कि उसकी ज़िंदगी पूरी तरह परफेक्ट है। लेकिन परफेक्ट कभी कुछ हो पाया है? ये जवाब तो कोई नहीं दे सकता लेकिन अनन्य की लाइफ बहोत जल्दी बदलने वाली है और इस सबसे अनजान अनन्या आज इसी भ्रम में है की उसकी लाइफ परफेक्ट है!
...
रात करीब दस बजे वह घर लौटी।
रोहन पहले से उसका इंतज़ार कर रहा था।
"थक गई होगी।"
उसने खुद अपने हाथों से अनन्या के लिए कॉफ़ी बनाई।
अनन्या ने कप हाथ में लेते हुए कहा—
"कभी-कभी डर लगता है... कहीं ये सारी खुशियाँ.... किसी की नज़र न लग जाए।"
रोहन मुस्कुराया।
"जब तक मैं हूँ... तुम्हें कुछ नहीं होगा और मेरे होते हुए हमारी खुशियों को किसी की नजर नहीं लग सकती मेरी जान "
अनन्या ने बिना कुछ सोचे अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया।
उसे नहीं पता था कि जिस इंसान पर वह सबसे ज़्यादा भरोसा करती है... वही उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल बनने वाला है।
...
उसी रात...
शहर के दूसरे छोर पर एक सुनसान कैफ़े में एक महिला पहले से बैठी थी।
कुछ ही देर बाद रोहन अंदर आया।
उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई और सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।
महिला ने मुस्कुराकर अपना चश्मा उतारा।
वह निशा थी।
दोनों कुछ पल तक एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर निशा ने धीरे से रोहन का हाथ अपने हाथ में ले लिया।
"आज भी उसने कुछ शक नहीं किया?"
रोहन के होंठों पर एक ठंडी मुस्कान उभरी।
"अनन्या हम दोनों पर आँख बंद करके भरोसा करती है।"
निशा ने राहत की साँस ली।
"अच्छा है... क्योंकि अब अगला कदम उठाने का समय आ गया है।"
रोहन ने धीमे स्वर में कहा—
"बस कुछ दिन और... फिर उसकी पूरी कंपनी, उसकी सारी दौलत... सब हमारा होगा।"
दोनों की आँखों में लालच साफ़ दिखाई दे रहा था।
उसी समय कैफ़े के बाहर से किसी के कदमों की आहट आई।
दोनों एकदम चुप हो गए।
काँच के दरवाज़े के उस पार कोई खड़ा था...
और ऐसा लग रहा था जैसे उसने उनकी पूरी बात सुन ली हो...




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